रणकपुर जैन तीर्थ

विश्व प्रसिद्ध राणकपुर
अरावली की गौद में, बसा हुआ एक धाम,
जिस जगह यह बसा हुआ, था मालगढ़ गांव,
मालगढ़ था बसा हुआ, एक नदी के तीर,
मघाई उसका नाम है, जिसका मीठा नीर,
राणा कुम्भ के मन्त्री, रहे थे धरण शाह सेठ,
मन्दिर अनूठा बना गये, देता विश्व हैं पैठ,
चौदह सौ चवालिस खम्भे, पर खडा किया एक वन,
खम्भा अधूरा कुम्भा का एक, पूर्ण न हुआ वचन,
आदिनाथ को समर्पित, मन्दिर यह विशेष,
अबुज पहेली लिये बैठा, एक नाग शेष,
चार दिशा में चार मुख, चौमुखी मन्दिर,
नौबत देख वहां का, हर कोई होता अधीर,
आरती होती हैं वहां, लगती बोली नित,
पूजा की शोभा बढाये, घंटी नर नारी की प्रित,
कल्पतरू का शैल पर्ण, हैं रोयिण का पेड़,
कार्तैय पंच धड़ वहां, हैं हस्ती बैजोड़,
आठ एक सौ देवरी, प्रक्षालित प्रतिदिन,
चारों द्वार भूतल रखे,हैं कारण अनगिन,
घी दीप आरती , घिसता चंदन रोज,
चांदी अर्क से होती है, भैरव पूजा रोज,
नैमिनाथ,सुर्य मन्दिर,मन्दिर वहां अनेक,
शिल्पकला की कलाकृति, एक से बढकर एक,
आनन्द-कल्याण की पेढी, करती काम भरपुर,
उस धाम का नाम है,विश्व प्रसिद्ध “राणकपुर”।।
रचनाकार
मदन सिंह सिन्दल “कनक”
अध्यापक (कवि,लेखक)
जैतारण,कुम्भलगढ़,राजसमन्द।

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