आत्महत्या

-आत्महत्या- एक कायरता की निशानी।
आत्महन्ता:, न क्षम्यते प्रभो।- आत्महत्या कराने वाले को ईश्वर भी क्षमा नही करते।
1. आत्महत्या किसे कहें?- वर्तमान इस विध्वंसकारी समय में एक नई कपोल कल्पना ने जन्म लिया है।अपने आप को मृत्यू के हवाले करना अर्थात स्वयं किसी प्रकार से स्वयं की जान लेना जबकि यह कृत्य करने योग्य है ही नहीं। मेरे विचारों में जो यह कृत्य करते हैं उसे मैं कायर समझता हूं, कहता हूं।
 जब ईश्वर ने आपको वो सब गुण दिए जिससे इंसान विकट से विकट मुसीबत से अपने आप को पार लगा सकता है तो फिर भी लोग क्यूं अपनी जान दे देते हैं। इंसानों की तरह जानवरों को भी अति मुश्किल घड़ी का सामना करना होता है परंतु वह कभी अपनी जान नहीं लेते। तो इस बात से स्पष्ट होता है कि कोई भी जीव खुद की जान को नहीं लेता मगर उसे अपनी जान को लेने को प्रेरित किया जाता है और कहीं ना कहीं उसे यह बताया जाता है कि यह करने से उससे मुश्किल घड़ी से छुटकारा मिल सकता है लेकिन ऐसा नहीं है। जिस कारण से आपने स्वयं की हत्या की हैं वह आपके परिवार को और मुश्किल में डाल देता है। इस बात से यह भी पता चलता है कि आपके आत्महत्या करने से समस्या समाधान नहीं होता। यदि किसी की हत्या के पीछे कोई भी कारक हैं तो वह आत्महत्या नहीं कही जा सकती क्योंकि हत्या स्वयं के हाथों से दूसरों द्वारा करवाई गई है। अतः बिना कारण से कोई अपनी हत्या करता है तो आत्महत्या माना जा सकता है नहीं तो यह वैचारिक, भावनात्मक हत्या ही कही जाएगी जो दूसरा व्यक्ति अपने हित के लिए दूसरे के दिमाग में इतना अवसाद भर देता है कि  वह अपनी हत्या करने को प्रेरित हो जाता है और यह समाज में अस्वीकार हैं।
2. आत्महत्या के कारक/कारण- वर्तमान में हो रही लगातार हत्याओं पर दृष्टिपात करें तो यह बात स्पष्ट होती है कि लोगों में वैचारिक आत्म नियंत्रण और भावनात्मक संयम की कमी नजर आती हैं। इनकी कमी के कारण ही आज वृद्ध-बालक, अमीर-गरीब सभी प्रकार के लोग इस प्रकार की हत्या का वरण कर रहा है। वर्तमान समय की सामाजिक व्यवस्था, शिक्षा,पारिवारिक संबंध व्यक्ति के अंदर वैचारिक व भावनात्मक रूप से मजबूत करने का अवबोध करवाने में नाकाम साबित हो रही है। छोटी सी बात को लेकर अपने अंदर से इतना आतंकित हो जाता है कि वह अपने नियंत्रण खो बैठता है और अकाल मौत को वरण कर बैठता है।
3. आत्महत्या बढ़ने के कारण- जब मैं लगभग 15 वर्ष का था तब तक मुझे आत्महत्या जैसे शब्दों के बारे में जानकारी नहीं थी, हो सकता है इसका कारण ग्रामीण परिवेश रहा हो। जैसे ही उच्च शिक्षा हेतु शहरों की ओर बढ़े तो इस प्रकार के शब्द व कृत्य ने मन को विचार में डाल दिया, भला कोई अपने हत्या स्वयं ही क्यों करना चाहेगा। सोच विचार करने से पता चला कि यह आत्महत्या शब्द लोगों को अति प्रिय शब्द लगता है जो अपने जीवन के साथ जोड़ते हैं या जुड़वाना चाहते हैं और अपनी मुसीबत कम करना चाहता है। इसके कई कारण है-
(i) वैचारिक अपरिपक्वता।
(ii) भावनात्मक अपरिपक्वता।
(iii) मानसिक अवसाद।
(iv) मुसीबतों से भागने की प्रवृति।
(v) आत्महत्या से ऊपर आत्मा हित व आत्म सम्मान को मानना।
(vi) सदैव ऊपर की ओर बढ़ने की अति महत्वाकांक्षा रखना। आदी
4. आत्महत्या में कमी कैसे लाये?- वर्तमान में आत्महत्या करने के कई कारण सामने है। इन सब कारणों का पता करके हमें वैचारिक, भावनात्मक, मानसिक परिपक्वता वाली उचित शिक्षा देनी चाहिए। परिवार के परिजनों द्वारा अपने परिवार के युवा और बच्चों के साथ आत्मीयता का व्यवहार करना चाहिए। जिससे समय-समय पर अपने विचारों को व्यक्त करते रहें। मानसिक संतुलन हेतु योगिक क्रियाएं करते रहें। महत्वाकांक्षा को जीवन से ज्यादा महत्व वाली नही समझे।
5. निष्कर्ष- अब और इस प्रकार के मामले नहीं बड़े इस हेतु से हमें अपने आने वाले पीढ़ी, बच्चों, युवा आदि को मानसिक रूप से समस्या का सामना करने के लिए मानसिक, वैचारिक, भावनात्मक रूप से परिपक्व करना पड़ेगा। उन्हें बताना पड़ेगा कि नाडी के सूखने से समुद्र नहीं सुखाकरता अर्थात हमें छोटी समस्या को तुरंत और अपने अनुसार निपटाना और नही निपट सकें तो अपने परिवार या विश्वासपात्र को बताना चाहिये। अतः महत्वाकांक्षा और आत्मग्लानि आदि को जीवन से ज्यादा महत्व नहीं दें। समस्या का सामना करें और अधीर ना हो, आत्महत्या करने वाला हमेशा कायर ही कहलाता है।

लेखक-
मदन सिंह सिन्दल “कनक”
(कवि,लेखक)
सादडी,पाली,राजस्थान।

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