गुरु की कुण्डलियां
गुरु पर कनक की कुण्डलियाँ
गुरु ज्ञान की खान जान, मत बन तू अंजान।
समय चुक पछताये गा, नही रहेगा भान।।
नही रहेगा भान, दर बदर भटकता फिरे।
बिन पतवार की नाव, ज्यों सागर में तिरे।।
धर ले गुरु चरण को सिर, ज्यों नृप मुकुट धरे।
तर जा भवसागर पार,जो गुरु वंदन करे।।1।।
गुरु आप पधारिया, कर दो जोडे प्रणाम।
अन्तस मन में ज्ञान भरो, मुझे दो विद्या दान।।
मुझे दो विद्या दान, अन्तस मन का तम हरो।
बन घी दीपक आज, अज्ञानी में ज्ञान भरो।।
आप हो कुम्भकार, नये दीप निर्माण करो।
गुरु कहुँ भले शिक्षक, अथाह ज्ञान वर्षा करो।।2।।
----------मदन सिंह सिन्दल “कनक”
गुरु ज्ञान की खान जान, मत बन तू अंजान।
समय चुक पछताये गा, नही रहेगा भान।।
नही रहेगा भान, दर बदर भटकता फिरे।
बिन पतवार की नाव, ज्यों सागर में तिरे।।
धर ले गुरु चरण को सिर, ज्यों नृप मुकुट धरे।
तर जा भवसागर पार,जो गुरु वंदन करे।।1।।
गुरु आप पधारिया, कर दो जोडे प्रणाम।
अन्तस मन में ज्ञान भरो, मुझे दो विद्या दान।।
मुझे दो विद्या दान, अन्तस मन का तम हरो।
बन घी दीपक आज, अज्ञानी में ज्ञान भरो।।
आप हो कुम्भकार, नये दीप निर्माण करो।
गुरु कहुँ भले शिक्षक, अथाह ज्ञान वर्षा करो।।2।।
----------मदन सिंह सिन्दल “कनक”
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