अंगद पैर जमाना

 ।।पैर जमा कर ऐंठ गये।।
छोड सादडी को शहर चले,
दाना-पानी कमाने को।
खुब कमाया और कमा रहे,
आननदीत जीवन जीने को।।
काल कोरोना आया ऐसा,
रोक दिया हैं सांसों को।
कुछ निकल पड़े जो पहुंच गये,
हम राह देखते रहे, जाने को,
मन हमारा भी व्यकुलीत हैं,
घर हम भी चले जाये,
फिर बार बार सोचे यह मन,
गाडी बिन कैसे आये,
इसी लिये मन मार के हम,
लगा आसन यहां बैठ गये,
माया नगरी की महामारी में,
पैर जमा कर ऐंठ गये।।

रचनाकार
महेंद्र हरी सिंह
सादडी,पाली,राजस्थान।




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