फिल्मी दुनिया का सच्च

 -फिल्मी दुनिया और सच
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इस जटिल विश्व में अति व्यस्तता के समय में प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए मनोरंजन के साधनों की खोज में रहता है फिर वह चाहे तो प्राकृतिक हो या कृत्रिम, सुगम हो या दुर्गम। मनोरंजन यानी मन को प्रसन्न चित्त करने के लिए कोई विशेष नाट्य रूपांतरण होना  भी आवश्यक हैं जो चाहे शब्दों से, हावभाव से, नाटक, नृत्य व संगीत। इन सब कार्यों के संपादन हेतु हमें जरूरत रहती हैं किसी न किसी कलाकार की। जो इस प्रकार के कार्य को पूर्ण लगन के साथ प्रदर्शित करें कि उसे देखने, सुनने वाले का मन आल्हादित हò जाये। प्राचीन समय में नुक्कड़ नाटक होते थे, कहानी कही जाती थी, चौपड़  पढ़ी जाती थी । वह सब मनोरंजन के साधन आजकल अदृश्य हो गए हैं और उसकी जगह फिल्म सिटी,फिल्मी दुनिया ने अतिक्रमण कर दिया है। प्रारंभ में तो फिल्मी दुनिया लोगों के सामने आदर्श के साथ-साथ पुराने अच्छे समय को याद करने, अपने पुराने जमाने को काल्पनिक जीने का अवसर देते थे- अपने नाट्य रूपांतरण के माध्यम से । पर अब ऐसा कुछ नहीं देखने को नही मिलता और मिलता है तो नहीं के बराबर। पहले फिल्मी नाटक और अपने किरदार को लोगों को ध्यान में रखकर किया करते थे पर अब वह सब देखना पड़ता है जो नाटककार कर रहा है । समय धीरे-धीरे बदल रहा है फिल्में  भी अपने पैर और गहरे जमा रही हैं। आज कल वो सब देखने को मिल जाएगा जिससे समाज,परिवार, व्यक्ति को किस प्रकार हानि पहुंचाने और कैसे बचना है परंतु यह उचित ही नहीं है। हमारे नौनिहाल, नोसिखिये  उन्हें जब से समझ आने लगती हैं। उस समय से ही उनके मानस पटल पर ऐसे-ऐसे प्रतिबिंब बन जाते हैं कि उसकी पूर्ति करने में उसे अपने जीवन को दांव लगाना होता है। आज के समय में फिल्म जगत में यही हो रहा है। फिल्मों के अंदर यह बताते हैं कि आत्महत्या कैसे करते हैं? हत्या कैसे करते हैं? आजकल बिना फिल्म के अपने जीवन में सत्य में कर रहे हैं और बता रहे हैं। आजकल ऐसे नित नए मामले आ रहे हैं जो मृत्यु को वरण कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण फिल्म जगत में कलाकारों की गुटबाजी, कलाकारों की प्रतिस्पर्द्धा । जो मंच पर हमें हन्साते हैं वे वास्तव में उतने खुश नही होते जितने दिखते हैं। शायद इससे कितने ही गुण दुखी रहते हैं। अपने काम को लेकर और आजकल भाई-भतीजावाद के कारण फिल्मी दुनिया में उभरते सितारों का जीवन संघर्षमय हो गया है। इस संघर्ष के कारण वे  ऐसा काम कर देते हैं जो समाज को सकारत्मक प्रेरणा की जगह नकारत्मक प्रेरणा  देते हैं। यहां तक कि आत्महत्या कर देते हैं जो समाज, जीवन  के लिए अभिशाप के समान माना जाता है।
लेखक
मदन सिंह सिन्दल “कनक”
सादडी,पाली,राजस्थान।

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