आत्मनिर्भर भारत

●आत्मनिर्भरता आज की आवश्यकता●
■आत्मनिर्भरता का आशय-  “ पराधीन सपनेहूं सुख नाहीं”
आत्मनिर्भर शब्द पर ध्यान करें तो यह वह शब्दों का मेल है- आत्म अर्थात स्वयं और निर्भर अर्थात अवलंब। इसका अर्थ हुआ स्वयं पर अविलंब या स्वावलंबन।  बैसाखी पर चलने वाला व्यक्ति हमेशा सहारा ढूंढता है अतः सीधे व सरल शब्दों में आत्मनिर्भरता का आशय यह है कि हमें मनसा(मन), वाचा(वचन), कर्मणा(कर्म) से अपने आप पर निर्भर होना। वैचारिक व व्यावहारिक आत्मनिर्भर होना ही आज के परिपेक्ष में सही मायने में आत्मनिर्भरता है। जब तक अन्य विचारों पर निर्भर रहेंगे तो व्यवहारिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन सकते हैं अतः आत्मनिर्भर होना, स्वावलंबी होना, वैचारिक व व्यवहारिक आत्मनिर्भर होना ही व्यक्ति, समाज, देश के हित में हैं। वरना पराधीन यानी दूसरों पर निर्भर रहकर तो स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता है। आत्मनिर्भर होने का आशय यह कतई नहीं है कि दूसरों से अलगाव करना, इसका आशय है अपने आपको इतना स्वावलंबी बना देना कि दूसरों के आगे  भिक्षुक आंखें व खाली हाथ लेकर खड़ा नहीं रहना पड़े। हाल ही में प्रधानमंत्री ने एक मंत्र दिया- वॉकल फोर लोकल। यह एक आत्मनिर्भर होने का महामंत्र है। जिसका अर्थ है अपने उद्यम को पहचानकर अवसर देना और आगे बढ़ाना ताकि हमारी आत्मनिर्भरता भी किसी पर निर्भर नहीं रहे। विश्व पटल पर व्यक्ति, समाज, देश का नाम गर्व से लिया जा सके। जो वर्तमान में दृष्टिगोचर हो भी रहा है।
■आत्मनिर्भरता की आवश्कता—
आत्मनिर्भर होना किसी भी सजीव के लिए एक मूलभूत आवश्यकता होनी चाहिए। जब कोई भी सजीव आत्मनिर्भर नहीं होता है तो उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। यदि हम अपनी आवश्यक वस्तु हेतु बार-बार किसी से याचना करें तो यह हमारे उद्यमशीलता पर प्रश्न खड़ा करता है और अपने कर्म का मूल्यांकन करता है। उदाहरण के तौर पर कोरोना महामारी में विश्व की महाशक्ति कहे जाने वाले देश भारत से दवाइयों की याचना कर रहे हैं और भारत इन दवाइयों में आत्मनिर्भर हैं। अतः दुनिया में भारत की गौरवता प्रकट हो रही है और संपूर्ण विश्व “भारत शरणम गच्छामि” का अनुसरण कर रहा है।इस बात से यह स्पष्ट होता है कि व्यक्ति, समाज, देश को अपनी आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर होना ही श्रेष्टकर हैं, फिर चाहे वह आत्मनिर्भरता वैचारिक हो, व्यावहारिक हो, औद्योगिक हो, कृषिगत हो या सेवागत हो।
■आत्मनिर्भरता किस- किस नें---
वर्तमान समय में हमें विचारों में, व्यवहारों में, कर्म(उद्यम)में, उपभोग में, सेवा क्षेत्र में, आत्मनिर्भरता कम और परनिर्भरता ज्यादा दिखती हैं। आत्मनिर्भर नहीं होना एक मानसिक गुलामी का संकेत भी होता है। अतः हमें आत्मनिर्भर होने के लिए सूक्ष्म चिंतन की महती जरूरत है। कहां से शुरू करें? अपने को आत्मनिर्भर बनाना। इन सब बातों पर गौर करते हैं तो मुख्यत: कुछ बातें सामने आती हैं--
●वैचरिक आत्मनिर्भरता—हमारा अतीत अकल्पनीय ज्ञान का कोष रहा है। विश्व को गति प्रदान करने का श्रेय हमारे गौरवमय अतीत को जाता है। इतने महान विचार, ज्ञान, अकूत्त विद्या, गणना शास्त्र होते हुए भी हम उन सब को भूलकर वर्तमान में वैचारिक परनिर्भरता दिखा रहे हैं। अतः हमारा सोच विचार स्वयं का होगा, अनुसरण का नहीं होगा तो कर्म भी आत्मनिर्भरता वाला ही होगा।
●व्यवहारिक आत्मनिर्भरता—कहने को तो सब व्यवहार (कर्म) से आत्मनिर्भर बताते रहते हैं परंतु जैसे ही मुश्किल समय आता है तो दूसरों की ओर सहायता के लिए आशा लेकर भागते हैं। यदि हम विचारों से स्वावलंबी हो जाते हैं तो उसे व्यवहार में लाना अति आवश्यक है। यह ही आत्मा मनोबल को बढ़ावा देता है।
●कृषिगत आत्मनिर्भरता—वैसे हमारा देश कृषि प्रधान हैं पर वर्तमान में कृषि में प्रधान रूप से अलगाव दिखाई देने लगा है। यदि कृषिगत आत्म निर्भरता बढ़ती है तो व्यक्ति,समाज,देश आत्मनिर्भरता का कीर्तिमान खड़ा कर सकता हैं।वर्तमान परिदृश्य  विकेट हैं, कृषि भूमि सिमट रही हैं और भव्य अट्टालिकाएँ पैर पसार रही हैं। ऐसे में बायो खाद खत्म हो रहा है, रासायनिक खाद का प्रयोग,कीटनाशकों का प्रयोग, कृषि कार्य को निंदनीय समझना इन सब कारणों से आज का जीवन अन्न विहीन होता नजर आ रहा है। अतः कृषिगत आत्मनिर्भरता अति आवश्यक है।
●दैनिक उपभोग वस्तुओं की आत्मनिर्भरता—हमें दैनिक उपभोग की वस्तुओं के निर्माण हेतु स्वावलंबी होना जरूरी है। यह आत्मनिर्भरता देश को ऊपर उठाने में काफी हैं। इस प्रकार यदि हमारा भविष्य सुखमय करना है तो हमें मन,विचार, वचन,कर्म से आत्मनिर्भर होना अतिआवश्यक हैं।
■आत्मनिर्भर कैसे बने?
प्रत्येक व्यक्ति समाज देश आत्मनिर्भर होना चाहता है परंतु क्या करें? कैसे करें?क्योंकि गरीबी, साधन, पूंजी, कौशल कुछ ना कुछ व्यवधान उत्पन्न करता है अतः हमें सबसे पहले इनसे विचारों को स्वतंत्र करना होगा। जब विचार स्वतंत्र होंगे तो सीमा से परे कुछ करने का प्रयास करेंगे। जिससे उनकी उद्यमशीलता का पता लग जाएगा और यदि किसी की भी उद्यम क्षमता का पता लग जाए तो कोई भी व्यवधान बाधा नहीं बन सकता फिर उसमें नये विचार पैदा होंगे पूंजी, साधन, कौशल यह सब स्वत:ह धीरे-धीरे उसके अनुरूप होते जाएंगे।अतः हमें विचारों, कर्मों, व्यवहारों को सीमा से परे रखकर आत्मनिर्भर,स्वावलंबी बन सकते हैं।
निष्कर्ष—प्रतिस्पर्धा के इस युग में हर कोई दूसरे की बैसाखी गिराने का प्रयास करता है और उभरते व्यक्ति, समाज, देश को गिराने का प्रत्येक  प्रतिद्वंदी विचार रखता है। वर्तमान परिपेक्ष में देखे  तो दूसरों की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर अपने को सर्वोच्च बनाने का प्रयास किया जा रहा है। अतः इस प्रकार की विकट स्थिति का सामना करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति, समाज, देश को आत्मनिर्भर होना अति आवश्यक है वरना उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
जो व्यक्ति, समाज, देश अपने विचारों, वचानों, कर्म से आत्मनिर्भर नहीं है। वह पराधीन के समान हैं और पराधीन या परनिर्भरता व्यक्ति, समाज, देश को स्वप्न में भी सुखी नहीं होने देता हैं। अतः हमें अपना गौरवमय अतीत, स्वर्णिम इतिहास को बचाए रखना है तो आज समय आ गया है आत्मनिर्भर होने का।
॥आत्मनिर्भर हो जाइए और व्यक्ति, समाज, देश को बचाइए॥

कलम से—
मदन सिंह सिन्दल “कनक”
अध्यापक (कवि,लेखक)
सादडी,पाली,राजस्थान।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट