लज्जा
कनक की कुण्डलियां
(लज्जा/लाज)
लाज जीवन का साज है, मत बन तू अंजान,
लाज गये ना शोभते, मानव देव समान,
मानव देव समान, क्यों तु दानवता धारे,
कर कर पाप अगाध, नरक में डेरा डारे,
कहत ‘कनक’ कविराय, आज लाज को तु राखे,
मिले सम्मान वैकुण्ठ, देख दानवता लाजे।।
रचनाकार
नाम-मदन सिंह सिन्दल “कनक”
(लज्जा/लाज)
लाज जीवन का साज है, मत बन तू अंजान,
लाज गये ना शोभते, मानव देव समान,
मानव देव समान, क्यों तु दानवता धारे,
कर कर पाप अगाध, नरक में डेरा डारे,
कहत ‘कनक’ कविराय, आज लाज को तु राखे,
मिले सम्मान वैकुण्ठ, देख दानवता लाजे।।
रचनाकार
नाम-मदन सिंह सिन्दल “कनक”
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