योग महिमा

योग महिमा
तन हो कृशकाय और मन उन्माद भरें,
शक्ति रही न शरीर, फिर वो कैसे उन्माद करें
खोये आपा आप, मन में ग्लानि भरें,
मजाक बने हर जन का, शक्ति पर थू-थू करें,
तू कर ले ऐसा कुछ काम, जो शरीर संबल करें
खड़ा सब के बिच, फिर से हुंकार भरें,
भारतीय योगशास्त्र, पूरा विश्व पर भरी पड़े,
कर योग, रह निरोग,शरीर में शक्ति भरें,
21 जून को देख, विश्व पूरा योग करें,
योग की महिमा बहुत, तन में स्फूर्ति भरें,
जो हँसते थे कृशकाय पर, वो अब प्रणाम करें
यह लाभ मिले तब, जब नियत कोई योग करें।।

रचनाकार
मदन सिंह सिन्दल “कनक”
अध्यापक (कवि,लेखक)
सादडी,पाली,राजस्थान।

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