कोरोना का अन्त

कोरोना का अन्त
वाह रे कोरोना क्या खेल, खेल गया,
जन्मा कहाँ और कहाँ-कहाँ फैल गया,
सर्दी जुकाम सा ही रुप ले लिया,
नजला में भी डर पैदा कर लिया,
चाहे कोहराम मचा दे पूरी दुनिया में,
मात खायेगा माँ भारती की धरा में,
यहाँ का हर व्यक्ति मर्यादा की सीमा हैं,
स्वयं श्री हरि ने भी इस धरा को चुना हैं,
प्रकृति का वरदान हैं इस धरा को,
स्वयं ब्रह्मा का आशीर्वाद हैं इस धरा को,
स्वयं शिव धारण करते हैं इस धरा पर गंगा को,
जहाँ आयुर्वेद ने पैदा की प्रकृति से दवा को,
चाहे कर कौशिश भले ही यहाँ पसरने की,
ध्यान रहे हर देशवासी धार दे रहा परशुराम के फरसे की,
तेरा अन्त निश्चित हैं कोरोना इस धरा से,
तेरा वास्ता जो पड़ा हैं माँ भरती की वसुंधरा से।

------मदन सिंह सिन्दल “कनक”

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