नव जीवन शृंगार


        नवजीवन श्रृंगार करो
श्रीराम राज्य और भरत भूमि का,  क्या यह रूप निराला है,
त्राहि-त्राहि व अधर्म,पाप का, कैसा रूप विकराला है,

चारों दिशाओं में जिस की जय, भरत स्नेह सा भाई हो,
सुर,नर,मुनि की यही कामना, भरत धरा अवतारी हो,

जिसकी प्रजा सुख भोगती, द्वार कभी ना बंद पड़े,
कैसी घड़ी आज यह आयी, द्वार सभी के बंद पड़े,

हे।राम मेरे,है विनती तुमसे, भरत भूमि का कल्याण करो,
मूर्ख मानव के पाप कर्म का, अब तो आप उद्धार करो,

सूर्यवंश के सूर्य उदय का, थोड़ा तो प्रकाश करो,
निज हित के इस मानव का, तन में प्रकाश भरो,

जन शून्य धरा यह होगी, ऐसा आज आभास हुआ,
काल कवलित होगा जनमानस, ऐसा आज विश्वास हुआ,
कर जोड़ ‘मदन’ विनती है तुमसे, निराशा में विश्वास भरो,
COVID-19 की महामरी में, नव जीवन श्रृंगार करो।।

 रचनाकार
मदन सिंह सिन्दल #कनक 
अध्यापक

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