जन्म क्या?
जन्म क्या?
जन्म मरण के इस तांते में ,तू क्यूँ इतना झकडा हैं,
जन्म मरण तो इस जीवन के,एक तराजू दो पलड़ा हैं,
जन्म हुआ है सार्थक कर लो,जीवन से पुरुषार्थ बडा,
मरने का क्यूँ सोच-सोच कर,मृत काय ले क्यूँ खडा,
जन्मा होगा पेड़ धरा पर, क्या कभी उसने सोचा,
कौन करेगा भरण-पोषण,जितना तुमने आज सोचा,
जन्म तुम्हरा हुआ धरा पर,तुमने इसको लिया नही,
निमित्त मात्र हैं प्रभू का,फिर भी कर्म किया नही,
कर्म करो तुम इस जीवन में,फल की चाह नही करो,
मोह माया को छोड जीवन से, प्रभू को फिर याद करो,
जिस हेतु से जन्म हुआ हैं, कर्म अपना पूर्ण करो,
जन्म मरण के मोह पाश से,अपने को तुम मुक्त करो,
छुट गया यह अवसर कर से, प्रभू चरण में जब जायेगा,
जान कर के प्रभू निमित्त, फिर बहुत पछतायेगा,
जन्म मरण के इस तांते में ,तू क्यूँ इतना झकडा हैं,
जन्म मरण तो इस जीवन के,एक तराजू दो पलड़ा हैं।।
●मदन सिंह सिन्दल “कनक”
अध्यापक
सादडी, पाली,राजस्थान।
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