मैं तो ढूण्ढू राणा ने।

    *मैं तो ढूण्ढू राणा ने*

मैं तो ढूण्ढू राणा ने  हर अडावल री चोटी में 
मै ढूण्ढू उण पूंजा ने , हर पत्थर री ओटी में 
स्वाभिमानी जो छोड़ महल ने , भाग गयो तो जंगल में 
छोड़ दियो सुभोजन ने , मेवाड़ भौम रे मंगल में।।

मैं तो ढूण्ढू .................

कठे गयी वो खडग मेवाड़ी  , म्यान में जो रूकी नहीं ,                            
कठे गयी वो पगंडी मेवाड़ी  , अधिनता मे झुकी नही 
मै ढूण्ढू उण खडंग ने,
आज हर हिन्दु रे हाथो में,
मै ढूण्ढू उण पगंडी ने , आज हर हिन्दु रे माथा में।।

मैं तो ढूण्ढू .................

कठे गयी वो धाय माँ , जो बली चढायो चन्दन ने  
कठे गयी वो राधा मेवाडी , घर छोडीयो कृष्ण वन्दन में 
मै ढूण्ढू पन्ना ने , आज हर हिन्दु रे पत्ता में 
मैं ढूण्ढ उण मीरा ने , आज साधु रे जथा मे।।

मैं तो ढूण्ढू ................

कठे गयो वो भीलु पुंजो , सदा खडो तो माँ रक्षा मे  
कठे गये वे गोरा बादल , शिश दे दियो माँ रक्षा मे  
मैं ढूण्ढू उण पूंजा ने , आज हर भीलो री टोली मे,
मैं ढूण्ढू उण गोरा बादल ने , हर यौद्वा री टोली में।।

मैं तो ढूण्ढू ................

देश सीमा आज पुकार रही , गोरा बादल 
पूंजा जैसा यौद्वा ने 
राष्ट्र धरम आज पुकार रहा ,
राणा जैसा सपूता ने, जाग उठो ऐ सिंह सपुतों ,
ताले खोले आज  पिंजरो के 
क्योकि नोंच रहे माँ का सीना , 
झुण्ड कायर गिदड़ो के।।

मैं तो ढूण्ढू .................

✒मदन सिंह सिन्दल *"कनक"*

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