घोडी चढीया उतरे कोनी।

           🐎घोडी चढीया उतरे कोनी🐎

घोडी चढीया उतरे कोनी,बाँका पग रुके कोनी,
केशरिया बान्गा धारियोडा, किके आगे रुके कोनी,
अब पाछे पग रुके कोनी,क्यूं आगे पग धरे कोनी।

वीर रस ज्यां कण कण निपजे, सुर ज्यां हर धड में  निपजे,
फेरुं माँ क्यूं पुकार लगवे,रजवाडा राज रह्या कोनी,
अब पाछे पग रुके कोनी,क्यूँ आगे पग धरे कोनी।।

बेरी सूं क्यूँ हाथ मिलावे,हर बार थाने ठेंगा बतलावे,
फिर भी शर्म आवे कोनी,फिर क्यूँ खून खोंले कोनी,
क्यूँ सोया सिंघ जागे कोनी,
अब पाछे पग रुके कोनी,क्यूँ आगे पग धरे कोनी।।

आ धरती गोर धोरा री,आ धरती वीर सपूतां री,
फिर क्यूँ कालक मिटे कोनी,क्यूँ सोया सिंघ जागे कोनी,
अब पाछे पग रुके कोनी,क्यूँ आगे पग धरे कोनी।।

वीरां ने अब जागणौ पड्सी,देश खातिर लडनो पड्सी,
मायड छाती खंजर देख न,क्यूँ आज खून खोंले कोनी,
क्यूँ सोया सिंघ जागे कोनी,क्यूँ कायर गीदड नोँछे कोनी,
अब पाछे पग रुके कोनी,क्यूँ आगे पग धरे कोनी।।

                           🖋मदन सिंह सिन्दल कनक 

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